मंगलवार, 10 मार्च 2015

हमसफ़र

आज की मेरी स्वरचित कविता हमसफ़र पढ़ें। अपने विचार अवश्य व्यक्त करें। आपके सुझावों क ज़रिये मार्गदर्शन की प्रतीक्षा में ....  dj 

                                               हमसफ़र   

राह  तुम्हारी क़दम मेरे हों,
आँधी तूफ़ान या रेत के ढेरे हों,
चलना हमेशा साथ- साथ। 

सही ग़लत का भेद कहीं न हो,
अविश्वास का ज़हर कभी न हो,
बस चलना तुम साथ- साथ। 

शहद से मीठे बोल भले न हों, 
पुराने वो खेल चाहे न हों,
बस चलना तुम साथ- साथ। 

यौवन का सूरज चाहे ढल जाए,
बसंती बयार साथ छोड़ भी जाए,
बस चलना तुम साथ- साथ।

मुश्किलों भरी राह हो,

सिर्फ काँटें न कोई ग़ुलाब हो,
फ़िर भी चलना तुम साथ- साथ। 

मंज़िल का भी पता न हो अगर,

आसान या मुश्क़िल कैसी भी हो डगर,
कभी न छोड़ना हाथ,
बस चलना तुम साथ- साथ। 
बस चलना तुम साथ- साथ। 
(स्वरचित) dj  कॉपीराईट © 1999 – 2015 Google


इस ब्लॉग के अंतर्गत लिखित/प्रकाशित सभी सामग्रियों के सर्वाधिकार सुरक्षित हैं। किसी भी लेख/कविता को कहीं और प्रयोग करने के लिए लेखक की अनुमति आवश्यक है। आप लेखक के नाम का प्रयोग किये बिना इसे कहीं भी प्रकाशित नहीं कर सकते। dj  कॉपीराईट © 1999 – 2015 Google
मेरे द्वारा इस ब्लॉग पर लिखित/प्रकाशित सभी सामग्री मेरी कल्पना पर आधारित है। आसपास के वातावरण और घटनाओं से प्रेरणा लेकर लिखी गई हैं। इनका किसी अन्य से साम्य एक संयोग मात्र ही हो सकता है।
हमसफ़र के साथ पढ़ें और और लगे हाथ नीचे टिप्पणी में अपने विचार भी व्यक्त कर दें।
और नारी का ब्लॉग पढ़ना चाहें तो just clickhttp://lekhaniblogdj.blogspot.in/

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें