बुधवार, 18 मार्च 2015

ये रिश्तों की पहेली

'मन के मोती' में आज  मेरी डायरी  के  पन्नों में से एक.......... 

29 feb 2012  
at 2:00pm 
wednesday 
ये एक अद्भुत  और बहुत ही सुन्दर, सुखद अनुभूति है।  सच में, क्या दुनिया में ऐसा होता है ? लेकिन अनुभव करने के  पश्चात ऐसे किसी प्रश्न की आवश्यकता ही नहीं रह जाती। हाँ  ये होता है।  दो अलग अलग परिवारों संस्कारों में पले बढ़े लोगों में कईं वैचारिक , सांप्रदायिक ,पारिवारिक  मतभेदों के बावज़ूद , ऐसा लगाव, ऐसा मोह एक दूसरे के प्रति  हो जाना , निश्चित ही आश्चर्यजनक है। परन्तु असंभव नहीं है। उनके बीच रिश्ता कोई भी वो मायने नहीं रखता।  मायने रखती है सिर्फ और सिर्फ मानवीय संवेदनाएँ , आत्मा का जुड़ाव। जहाँ एक दूसरे के प्रति प्रेम और समर्पण का भाव होता है, वहाँ  व्यक्ति के चेहरे के हाव-भाव , उसकी भाव-भंगिमाएँ,उसकी हर एक प्रतिक्रिया,उसके अंदर चल रहे विचारों, बातों और अनुभूतियों से हमें अवगत करा देती हैं। जबकि इन सब में शब्द बिल्कुल नगण्य होते हैं। बिना शब्दों के किसी के मन की बातों  को जान लेना, उसकी भावनाओं को बिना बताए ही समझ लेना और उन भावनाओं में शामिल हो जाना। उसकी ख़ुशी में खुश हो जाना,उसके ग़म में हमें भी आँसु आ जाना।क्या ये किसी चमत्कार से काम नहीं है? गौर से समझा जाए तो  हर रिश्ता हमें क़ुदरत  के चमत्कारों का एहसास करता है,जो बहुत ही ख़ूबसूरत एहसास है। 
                                   कईं बार ये स्थिति अतिविचरणीय हो जाती है।  जब हमसे  रिश्ते में जुड़े उस व्यक्ति की परेशानियाँ, दुःख -तकलीफ़  हमारे लिए असहनीय सी हो जाती है। ग़म  उसे हो लेकिन दर्द हमें होता है। हम चाहते हैं कि उससे जुड़ी हर परेशानी या तो चुटकियों में दूर हो जाए या हमें मिल जाए। रक्त-सम्बन्धियों (खून के रिश्ते ) में तो ये भावनाएँ  स्वाभाविक होती हैं। लेकिन यदि रिश्ता किसी अपरिचित से जुड़ा हो तो ये और भी आश्चर्यजनक लगता है। किसी अनजान से इतना जुड़ाव इतनी हमदर्दी ?              
                कईं बार मन इसके पीछे के कारणों को जानने के लिए उत्सुक हो उठता है।लेकिन सटीक जवाब मिल पाना तो बहुत ही मुश्किल है।  शायद इसका कोई आदर्श जवाब ढूंढा जा  भी  नहीं सकता, क्योंकि शायद  हर व्यक्ति की सोच के अनुसार हमें इसके भिन्न -भिन्न  जवाब मिलेंगे। कोई इसे  क़ुदरत का करिश्मा कहेगा तो किसी के लिए ये सामान्य सी स्वाभाविक घटना हो सकती है। शायद कुछ लोग इसे जीवन की  अनिवार्यता मानें और पता  चला कोई तो इसे केमिकल लोचा  ही कह दे। जवाब अनुभव के आधार पर बदलते रहेंगे। बशर्ते  हम उसे उस गहराई उस शिद्दत से अनुभव करें। 
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