सोमवार, 27 अप्रैल 2015

धरती की पुकार

धरती की चीत्कार सुनी क्या,
क्या पुकारे धरती माँ,
तूने अगर सहेजा होता, 
फिर मैं ये सब करती ना। 

हरे भरे थे मेरे गहने,
हर एक तुमने छीन लिया, 
वृक्ष विहीन हो जियूँ मैं ऐसे, 
जैसे रघुवर बिन जिए सिया। 

जब चाहा तब मेरा सीना ,
ऐसे तुमने चीर दिया ,
मैं तो अमृत देती तुझे, 
तूने एक बून्द  नीर भी न दिया।  

सोच के तो देख ए मानव ज़रा ,
पाला पोसा तुझे बड़ा किया,
तूने अस्तित्व मिटाने को मेरा, 
एक पल भी न इंतज़ार किया। 

मैं न ऐसे प्रलय मचाती, 
गर तूने समझा होता ,
पूजा भले न होता मुझे, 
कुछ तो सम्मान दिया होता। 

अन्न तूने खाया मेरा,
उसका क़र्ज़ भी क्या तू चुकाएगा, 
मुझमे ही पैदा हुआ और ,
इक दिन मुझमे ही मिल जायेगा। 

कभी वन्दनीय कहलाती थी पर ,
आज तेरा वंदन मैं करती हूँ ,
मत कर ये अत्याचार ,
तुझसे बस यही निवेदन करती हूँ।  

वरना भरे सजल नेत्रों से,
मैं विवश यही अब करती हूँ, 
तूने हरा है छीना मुझसे,
तेरा लाल मैं खुद में भरती हूँ। 

(स्वरचित) dj  कॉपीराईट © 1999 – 2015 Google

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मेरे द्वारा इस ब्लॉग पर लिखित/प्रकाशित सभी सामग्री मेरी कल्पना पर आधारित है। आसपास के वातावरण और घटनाओं से प्रेरणा लेकर लिखी गई हैं। इनका किसी अन्य से साम्य एक संयोग मात्र ही हो सकता है।
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रविवार, 26 अप्रैल 2015

इन्हें सलाम

आज चलते चलते एक विज्ञापन पर नज़र पड़ी। विज्ञापन था डांस वर्कशॉप का। पर वर्कशॉप कुछ अनोखी थी। इसकी दो विशेषताएँ एक तो ये निःशुल्क थी और वो भी सभी के लिए नहीं। सिर्फ उन चुनिंदा बच्चों के लिए जो बस्तियों /झुग्गी झोपड़ियों में निवासरत हैं और शासकीय विद्यालयों में शिक्षारत। देखकर ख़ुशी हुई सराहनीय प्रयास लगा। अच्छा लगा जानकर कि कुछ और भी लोग हैं जिनका इस और ध्यान है और वे इनके लिए कुछ करना चाहते हैं। 
वैसे भी देखा जाये तो अधिकांश प्रतिभाएँ आजकल छोटे-छोटे गांव शहर और बस्तियों से ही निकलकर आ रही हैं। अधिकतर टैलेंट हंट्स के विजेता भी छोटे क्षेत्रों से ही आते हैं और  अपनी प्रतिभा सिद्ध करके दिखाते हैं। जरुरत है तो बस सही मार्गदर्शन के जरिये उन प्रतिभाओं को निखारने की। प्रतिभा सभी में छुपी होती है फर्क बस इतना है कि सम्पन्न  परिवारों के बच्चों के लिए तो कई माध्यम हैं जिनसे मार्गदर्शन  लेकर वे अपने मनचाहे मुकाम तक पहुँच जाते हैं। पर कई बच्चे प्रतिभा होते हुए भी धनाभाव के कारण उसे सबके समक्ष नहीं ला पाते। ये बहुत ख़ुशी की बात है कि कुछ लोग हैं जो  अपनी प्रतिभा का सही उपयोग इन गरीब प्रतिभावान बच्चों को निखारने उन्हें आगे बढ़ाने में योगदान देकर कर रहे हैं। इनके जज़्बे को मेरा सलाम। 

20 अप्रैल के दैनिक भास्कर समाचार में भी कुछ इसी तरह की न्यूज़ पढ़ने को मिली थी इंदौर की एक बस्ती गोमा की फेल में रहने वाले 35 वर्षीय राजू सैनी के विषय में जिनके पिता एक रिक्शा चालक हैं राजू की पढ़ने के प्रति लगन देखकर उन्होंने राजू को बीएससी और एमए  करवाया। इस दौरान राजू ने महसूस किया कि उनकी तरह पढ़ने की लगन बस्ती के और भी युवाओं और बच्चों में हैं पर धनाभाव के कारण सभी शिक्षा से विमुख हो परिवार का पालन पोषण करने में लगे हैं। राजू ने इसका हल स्व स्तर पर करने की ठानी। दस लोगों का समूह बनाकर साथ में प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में जुटे।अपनी प्रतिभा के बल पर सभी का मार्गदर्शन किया मेहनत रंग लाई और राजू सहित चार लोगों का चयन शासकीय पदों पर अलग अलग विभागों में हुआ। जहाँ राजू सहायक स्टेशन मास्टर बने वहीँ उन्हीं की बस्ती के विजय सोनी जो कि कभी हेल्पर का काम कर परिवार चलाते थे आज एसबीआई मैनेजेर हैं। सिलाई करने वाली सोनू आज टैक्स असिस्टेंट है तो पेपर बांटकर आजीविका चलाने वाले कन्हैया प्रजापति अब टीसी हैं। दिनेश कुमार लात्या कभी दिहाड़ी मजदूर थे आज सूबेदार बन गए। पर ये सिलसिला यहाँ थमा नहीं सभी चारों ने तय किया बाकी छः लोगों की तैयारी भी वे जारी रखवाएँगे। इसे आगे बढ़ाते हुए उन्होंने "चाणक्य" नाम से संगठन बनाया और अन्य बस्तियों के युवाओं को भी शामिल किया आज राजू पदोन्नत होकर देवास में स्टेशन मास्टर हो गए हैं। वे रेलवे की ड्यूटी के साथ बस्ती के बच्चों का भविष्य बनाने की ड्यूटी भी बड़ी कर्मठता से निभा रहे हैं आलम ये है की 10 का समूह आज दस गुना हो चुका है। कईयों का भविष्य सुधर गया है और कई "छोटू" बनने से बच गए। राजू सैनी जी और इनके साथियों को हमारा सलाम। 

सोमवार, 13 अप्रैल 2015

"छोटू"

वो रेत,
और 
सूखे पत्ते 
रेत पर बनते बिगड़ते , 
कदमो के निशान ,
गवाह हैं 
गुजरते हैं रोज़ 
वहां से कुछ 
"इंसान" 
सभी साफ़ स्वच्छ वस्त्रों में लिपटे 
मलिन नहीं। 
"मलिन" तो बस "वो"एक ही घूमता है,
हर रोज उन्ही वस्त्रों में 
वो "छोटू"…।
बेचता है वहाँ,
कुछ फूल कुछ गुब्बारे,
राहगीर दिखते हैं जहाँ। 
झट से दौड़ पड़ता है उनकी तरफ,
आते हैं कईं बार दिलदार, 
ले जाते हैं उस से,
कुछ फूल कुछ गुब्बारे। 
और दे जाते हैं उसे, 
चन्द रुपए, 
मिल जाता है उसे,
एक वक़्त का खाना।  
पूरा नहीं,
आधा अधूरा ही सही। 
बस यही जीवन है उसका,
यही दिनचर्या। 
सोचती हूँ कईं बार.…… 
ले आऊँ छोटू को ,
अपने साथ, 
अपने घर.… 
दूँ उसे पेट भर खाना,
चाहती हूँ,
न ढोये वो "मन"पर 
उन "भारी" गुब्बारों और फूलों का बोझ 
उसके नन्हे कंधे ढोये तो बस, 
कुछ किताबों का बोझ। 

मगर.…………………

पूरी हो मेरी ये सोच 
उसके पहले,
दिखता है मुझे एक और
 "छोटू" 
ये क्या..............???????? एक और ??????
फिर एक और.………… 
हर जगह "छोटू" ……?
जहाँ भी नज़र पड़ी,
दिखते हैं.…… 
अनगिनत छोटू ……।  
वो कहीं होटल की टेबल साफ़ करता "छोटू"
कहीं चाय बनाकर पिलाता, तो.....  
कहीं रस की चरखी पर गिलास धोता "छोटू" 
हर तरफ बस "छोटू" ही "छोटू".... 
फिर समझ ही नहीं आता.………:-( 
छोटुओं की इस भीड़ में से........... 
किसे ले जाऊँ घर……?????
और .............
किसके कंधों पर डालूँ...... .?
उन "चन्द" किताबों का बोझ ??????????? :-((

(स्वरचित) dj  कॉपीराईट © 1999 – 2015 Google

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शनिवार, 11 अप्रैल 2015

मुस्कान

आज dj की लेखनी का मन है,आपको एक संस्मरण के दर्शन कराने का। 
मैं इस बात से बिलकुल अनभिज्ञ हूँ कि ये संस्मरण मेरे पाठकों के लिए उपयोगी है या नहीं ?ये भी नहीं जानती कि किसी के व्यक्तिगत संस्मरण को पढ़ने में सभी पाठकों की रूचि है या नहीं ?मगर वो नन्हीं-सी बालिका और उसकी प्यारी सी मुस्कान,मुझे रोक ही नहीं पाई लिखने से.…ये संस्मरण आज भी मेरी अमूल्य यादों का एक अभिन्न हिस्सा है। मेरे दृष्टिपटल पर वैसा ही विराजमान है और उसकी वो प्यारी मुस्कान भी.…। आज यहाँ लिखकर उस गुड़िया की मुस्कान को आप सब के साथ बाँटने जा रही हूँ। 
            

               एक बार मैं अपने पति महोदय के साथ देवास माता मंदिर दर्शन करने के उद्देश्य से पहुँची।मंदिर ऊँची टेकरी पर स्थित है। मंदिर की चढ़ाई शुरू होने से अंत तक फूल-मालाओं और प्रसाद  के साथ-साथ मूर्तियों,तस्वीरों और अन्य वस्तुओं की दुकाने सजी हुईं थी। चढ़ाई खत्म होने के पश्चात् टेकरी पर दो मुख्य मंदिर हैं जिनमे माँ तुलजा भवानी और चामुंडा माता की मूर्तियां विराजित हैं।इन्हें आम बोलचाल की भाषा में लोग क्रमशः बड़ी माता एवं छोटी माता कहते हैं। जिन पाठकों 
ने इस धार्मिक स्थल का भ्रमण किया है,वे जानते हैं इन दो मुख्य मंदिरों के दर्शन के पश्चात् की जाने वाली परिक्रमा की परिधि करीब दस से बारह मिनट की है और परिक्रमा करते हुए इस परिधि के अंतर्गत अनेक देवी-देवताओं के कईं छोटे-छोटे मंदिर बने हुए हैं। इन मंदिरों के पुजारी सुबह से यहाँ आकर मंदिरो की सेवा-पूजा में लग जाते हैं। अपने साथ खाने पीने का कुछ जरूरी सामान साथ ही लेकर बैठते हैं क्योंकि चढ़ाई चढ़ने के बाद ऊपर खाने पीने की कोई व्यवस्था नहीं होती।(वर्तमान में कुछ थोड़ी बहुत दुकानों की व्यवस्था हो चुकी है।)
                       

                     हम भी  दर्शन के पश्चात परिक्रमा करने लगे सभी लोग हर मंदिर में एक-दो रुपये की दक्षिणा रखते चले जा रहे थे। एक मंदिर  में एक छोटी सी बालिका जिसकी उम्र शायद कुछ सात-आठ वर्ष होगी, अपनी दादी के साथ बैठी थी। साधारण पर एकदम साफ़-स्वच्छ कपड़े और करीने से बंधे हुए बाल। उसके चेहरे पर अलग ही आभा चमक रही थी। उस पर उसका इतना मासूम-सा मुखमण्डल कि उसे देखते ही मैं उस पर मोहित हुए बिना रह ही न सकी। वो शायद अपनी दादी से बड़े प्यार मनुहार से कुछ विनती कर रही थी।ये नज़ारा दूर से ही दिखाई दे रहा था। उस मंदिर के समक्ष पहुँची नहीं थी मैं अभी। इसलिए उसकी बातें तो हमारे कानों तक नहीं पहुँच रही थी मगर उसके चेहरे की भाव-भंगिमाओं से ये निश्चित था कि वो उनसे कुछ मांग रही थी और उसकी दादी उसे समझा रही थी।शायद कह रही थी इतनी चढ़ाई उतरकर नीचे जाने और फिर चढ़कर ऊपर आने में उन्हें कष्ट होगा।बालिका छोटी होते हुए भी काफी समझदार थी। शायद इसलिए उनके एक बार समझाने पर ही मान गई। पर उसके मुखमण्डल पर माँगी चीज़ न मिल पाने की उदासी 
तो फिर भी छलक ही आई थी।
                            

                           ये सारा घटनाक्रम देखते देखते आखिरकार हम उस मंदिर के समक्ष पहुंचे। पति महोदय का ध्यान भी मेरी तरह उसी घटनाक्रम की और था शायद..... और वो मुझसे भी अच्छी तरह सारी स्थिति को भाँप गए थे। मैं कुछ समझ पाती उसके पहले उन्होंने जेब में हाथ डाला...... मगर.... सिक्का निकाल कर दान पेटी में डालने की जगह......एक चॉकलेट निकाली और उस गुड़िया के हाथ में थमा दी। और उसके चेहरे पर तुरंत मुस्कान बिखर गई एकदम इंस्टैंट......जैसे किसी लाइट का बटन दबाया और तुरंत प्रकाश बिखर गया हो और उसकी वो मुस्कुराहट हम दोनों के चेहरों पर मुस्कान लाये बिना न रह सकी। वो शायद कब से चॉकलेट ही माँग रही थी,मगर इतनी चढ़ाई उतरकर उसके लिए चॉकलेट लेने जाना और वापिस आना उसकी उम्रदराज़ दादी के लिए बहुत ही पीड़ादायक था। और मन माँगी चीज न मिल पाना उस बालिका के लिए। उस एक छोटी सी चॉकलेट ने दो लोगों की पीड़ा का समाधान कर दिया। 
                 वैसे भी भारतवर्ष में कन्याओं को "देवी" का रूप माना जाता रहा है,शायद ईश्वर ने हमारे हाथों उसकी वो छोटी सी मुराद पूरी करना ठानी हो बहुत शांति और सुकून की अनुभूति हुई घटना के बाद उसे खुश देखकर। शायद हमने उस कन्या के रूप में सच में एक जीती जागती "देवी "को प्रसन्न कर लिया था। 
         
                   इस घटना के बाद से हमने तय कर लिया है कि जब भी किसी चढ़ाई वाले मंदिर या दर्शनीय स्थल पर जायेंगे तो एक दो अतिरिक्त पानी की बोतलें,कुछ अतिरिक्त खाना, कुछ चॉकलेट्स और एक फर्स्ट ऐड बॉक्स जरूर साथ लेकर जाएँगे। 
                   
                   इसे हम शायद दान तो नहीं कह सकते, मगर जीवन में ऐसी छोटी -छोटी खुशियाँ बाँटते रहने से मन को बहुत आनंद की अनुभूति होती है।दान चाहे पैसों का न किया जाये,मगर जो किसी की भूख को तृप्त कर सके, किसी का तन ढँक सके, किसी के चेहरे पर थोड़ी सी देर के लिए ही सही मुस्कान ला सके, ऐसा दान अपने जीवन में हम सभी को कभी न कभी कर ही लेना चाहिए। है! ना ? तो जरूर कीजिये। क्या पता आपके जीवन में भी कोई ऐसी गुड़िया आपके स्मृतिपटल पर वो सुन्दर मुस्कान छोड़ जाए। क्या कहते हैं आप? 
ना! ना! कहिये नहीं। लिखिए, नीचे टिप्पणी में। 

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गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

उफ्फ्.... ये मंज़िल!

जाने कहाँ और कैसे ?
खो गई थी मैं। 
खुद को भूल गई थी शायद ,
चल पड़ी थी,
किसी वीरान रस्ते पर ,
निर्जन था,
कोई दिखा नहीं,
कुछ मिला नहीं ,
न सुकून था ,
न सुख 
न आँसु ,
न दुःख ,
उदासीन सा 
' सबकुछ '
चुभता रहता था 
उस राह में 
' कुछ ' 
'वो' शायद जिसे 
काँटा कहते हैं.… 
'लोग'
उस काँटे की टीस 
उतनी न थी,
जितनी उस राह 
पर चलने की 'चुभन' थी। 
न जाने कैसा मोड़ था 'वो' 
जो चलते चलते 
अचानक ही आ गया था,
खुद को ढूंढ ही लिया मगर 
मैंने,
पा ली है,
एक नई राह.……… 
चलती रहूंगी अब उसी पर,
शायद अबकी बार.… 
मिल ही जाए 
मुझे 'वो' 
मंजिल,
जिसके लिए,
कहीं खो गई थी मैं.…
किसी जहाँ मे……
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ये कवितायेँ लिखते लिखते मुझे मंज़िल मिले न मिले आप जब कविता पढ़ते पढ़ते 
अंत में पहुंचेंगे तो आपको टिप्पणी का बॉक्स दिखेगा आपकी मंज़िल वही है… तो टिप्पणी करना न भूलें।  और इसे भी देख लें http://lekhaniblogdj.blogspot.in/ 

बुधवार, 1 अप्रैल 2015

क्या मैं भी हुनरमंद हूँ ?

रोज कुछ नया लिखती हूँ,
रोज कुछ नया गढ़ती हूँ,
बस लिख लेती हूँ,
इसलिए ही आजकल खुश दिखती हूँ।

वो उदासी वो निराशा,
अब गायब सी हो गई है,
लेखन से मन में,
राहत सी हो गई है।
लिखना तो बस अब ,
एक आदत सी हो गई  है।

शायद इसीलिए, आजकल,
ये कलम भी साथ देती है,
मेरे मन की तुरंत ही,
कागज़ पे उतार देती है।
और मुझ पर लदा हर बोझ ,
एक पल में ये हर लेती है।

कुछ नया करके
मन ही मन प्रसन्न हूँ।
ये सब कैसे हो रहा है,
सोचकर मै खुद भी दंग हूँ।
ये कागज़ कलम मुझे,
और इन्हें मैं पसंद हूँ।
आजकल लगने लगा है कि,
मैं भी एक हुनरमंद हूँ।
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मेरा वहम दूर जरूर कीजियेगा।टिप्पणी में लिखकर। 
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मेरा सुकून (कविता)

मुझे ये माहौल पसंद नहीं 
ये चैं -चैं  पैं-पैं,ये शोरगुल,
ये जोर-जोर से चिल्लाना ,
ये गाड़ी के हॉर्न को,
पीं -पीं करके,
देर तक जोर से बजाना,

मुझे तो पसंद है बस,
शांति में,
कागज़ कलम लेकर बैठ जाना,
सुबह सुबह,
उन दो चिड़ियों का,
यूँ प्यार से चहचहाना।
दिमाग में विचार,
और मुँह में चाय की चुस्की लेकर,
चंद शब्दों को,
कविता की माला में पिरो जाना।

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आपकी पसंद क्या है ? चहल-पहल या शांति ?निःसंकोच लिख दीजिए।और इन पंक्तियों के बारे में अपने विचार व्यक्त करना मत भूलियेगा। 
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